Sunday, May 10, 2015

"माँ"

एक अक्षर का शब्द है "माँ", लगता कितना सुनहरा,
जाने पहचाने इस शब्द में राज़ छुपा है गहरा !!

दर्द तकलीफ़ सहकर भी हमको इस दुनिया में लायी,
लेकर हाथों में पहली बार, वो दर्द सारा भूल गयी !!

भूखी रहकर खुद वो, पहले खाना हमको खिलाती,
अँधेरी रातों संग जगकर, बाहों में अपने सुलाती !!

नन्हें से बच्चों को वो, स्कूल जब भेजा करती,
बच्चों को रोता देख वो "माँ", खुद छुप छुप के रोती रहती !!

बच्चों के वापस आने की राह वो देखा करती,
सुन बच्चों की आवाज़ वो "माँ", गले से यू लगा लेती !!

बच्चों के साथ बनकर बच्चा, नख़रे सारे उठाती,
खुद आँसू गिराकर वो "माँ", लबो पे सबके मुस्कान सजाती !!

मुश्किल में देख बच्चों को, खुद भी टूट जाती,
लड़ने को उस मुश्किल से फिर, हिम्मत भी दे जाती !!

पढ़ा-लिखाकर जब हमें, वो बड़ा करती,
सफलता मिले हर मोड़ पर, रब से यहीं मांगा करती !!

फिर क्यू बच्चे उस "माँ" को यू ही ठुकरा देते,
नौ महीनों के उस दर्द को, नौ पल में भूल जाते !!

फिर उसी "माँ" को वो बच्चे बोझ समझने लगते,
तब डाल किसी वृद्धाश्रम में, खुद चैन से जीतें !!

बच्चों से होके जुदा वो पल पल मरा करतीं,
ख़ुशी समझकर बच्चों की वो "माँ" वहाँ भी रह लेती !!

तकलीफ में हो बच्चा तो वो उस पल भी दुआ करती,
क्यूँ इतना सहने पर भी वो "माँ" यही कामना करती !!

देखकर "माँ" का इतना त्याग, क्यूँ बच्चों का दिल ना पिघल पाया,
लिखतें - लिखतें तो आज मेरी "कलम" को भी रोना आया !!!

3 comments: