कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
दिन के उजियारे में, रात के अंधियारे में,
वो भीगी शाम में, किसी के इंतज़ार में,
दिल का हाल सुना जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
बारिश के मौसम में, छुपते हुए चाँद में,
वो नम पलकों से, कोरे पड़े कागज़ पे,
इन्द्रधनुष से रंग चुराकर, शब्दों को रंगीन कर जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
वो झूठे सच्चे ख्वाब में, कल्पना की बाढ़ में,
सूनी अँधेरी रात में, ख़ामोशी के साथ में,
यादों के बंद दरवाज़े खोल देती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
झूमती हवाओ में, रूसवा होती मुस्कान में,
होंठो की ख़ामोशी में, चेहरे की मायूसी में,
बिन कहे सब कुछ कह जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
उलझे हुए जवाबों में, टूटे हुए ख़यालो में,
धूंधली पड़ी यादों में, जलती हुई आँखों में,
बिखरे हुए सपनें फिर सजाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
ज़िंदगी की राह में, धुप में कभी छाँव में,
भीगी हुई पलकों पे, हसीं की चादर से,
गम सारे ओढ़ लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
जुदा हुए किनारों में, चमकते हुए सितारों में,
हँसते हुए चेहरों को, धोखा देती तसवीरों को,
फिर से सच मान लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
झूठी ख़ुशियों की सजावट में, चेहरे की लिखावट में,
हाथों की लकीरों में, पकड़ी हुई कलम से,
कलम को ही रुला जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
अक्षरों के जाल में, पाँत पाँत और डाल में,
बीते हुए कल में, थमे हुए जल में,
अपने ही अक्श को तलाशती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
दिन के उजियारे में, रात के अंधियारे में,
वो भीगी शाम में, किसी के इंतज़ार में,
दिल का हाल सुना जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
बारिश के मौसम में, छुपते हुए चाँद में,
वो नम पलकों से, कोरे पड़े कागज़ पे,
इन्द्रधनुष से रंग चुराकर, शब्दों को रंगीन कर जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
वो झूठे सच्चे ख्वाब में, कल्पना की बाढ़ में,
सूनी अँधेरी रात में, ख़ामोशी के साथ में,
यादों के बंद दरवाज़े खोल देती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
झूमती हवाओ में, रूसवा होती मुस्कान में,
होंठो की ख़ामोशी में, चेहरे की मायूसी में,
बिन कहे सब कुछ कह जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
उलझे हुए जवाबों में, टूटे हुए ख़यालो में,
धूंधली पड़ी यादों में, जलती हुई आँखों में,
बिखरे हुए सपनें फिर सजाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
ज़िंदगी की राह में, धुप में कभी छाँव में,
भीगी हुई पलकों पे, हसीं की चादर से,
गम सारे ओढ़ लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
जुदा हुए किनारों में, चमकते हुए सितारों में,
हँसते हुए चेहरों को, धोखा देती तसवीरों को,
फिर से सच मान लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
झूठी ख़ुशियों की सजावट में, चेहरे की लिखावट में,
हाथों की लकीरों में, पकड़ी हुई कलम से,
कलम को ही रुला जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!
अक्षरों के जाल में, पाँत पाँत और डाल में,
बीते हुए कल में, थमे हुए जल में,
अपने ही अक्श को तलाशती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!