Friday, September 18, 2015

" रक्षाबन्धन "

अपनत्व, सहयोग, प्यार का दिन वो ऐसा आता है,
लबों पे लाके मुसकान वो धागा कलाई पे बंध जाता है !!
भाई - बहन का असीम स्नेह जब कलाई पे छा जाता है,
रक्षाबन्धन के पावन पर्व को परिभाषित कर जाता है..!!!

खट्टे मीठे लम्हों की याद लिए धागा बंध जाता है,
फिर साथ बिताई यादों का कोहिनूर बन जाता है !!
खुद सूरज सा जलकर जब चाँद, बहन को बना जाता है,
तब सफलता, समृद्धि, स्नेह का बहन से "आशीष" मिल जाता है..!!!

सूत्र बाँध रक्षा का जब रक्षा-वचन लिया जाता है,
वचन निभाने को फिर, हर लक्ष्य को छू जाता है !!
दिये सा जलकर उसका तेज अँधियारा मिटाता है,
भाई - बहन के प्रेम का "प्रतीक", धागा बन जाता है..!!!

तर होके धागा स्नेह प्यार में, विश्वास अंकुर कर जाता है,
नाजूक सा धागा न जाने, कैसे रक्षा करता है !!
इसी विश्वास की अमिट छाप जब कलाई पे अंकित होती है,
बंधा हुआ वो नाजूक धागा, "रक्षासूत्र" कहलाता है..!!!

Monday, July 27, 2015

"भाई" तू याद बहुत आता हैं !!

डरा हुआ सा, कुछ सहमा सा, आँसु बहता जाता हैं,
आँखों से हो विदा वो, मोम सा पिघलता हैं !!
रोती हुई उन आँखों को जब कोई नहीं हँसाता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

कुछ घबराता, कुछ सिसकता आँसु सब कह जाता हैं,
अकेली सी, उन आँखों में सिर्फ दर्द ही कहराता हैं !!
मुरझायी हुई पलकों को जब कोई नहीं सहलाता हैं,
ऐसे लम्हों में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

भूली हुई उन यादों से रंग छीन ले जाता है,
बिन पतवार ही वो अपना रास्ता बनाता हैं !!
ख़ामोशी का आलम बनके सिसकिया सुनाता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

सुनी करके हँसी को अपने पास ही रख लेता हैं,
लबों की मुस्कान को, मायूसी बना जाता हैं !!
आँसुओ को रोकने वो हाथ जब नहीं आता हैं,
ऐसी घड़ी में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

आँखों को दे सूनापन, घुम कही हो जाता हैं,
जाते जाते होंठो पे एक झूठीं मुस्कान दे जाता हैं !!
डरी हुई आँखों को जब पलके गले लगाती हैं,
ऐसे लम्हों में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

बीती हुई उन यादों का आयना दिखता हैं,
होके दूर आँखों से, हाथों में कैद हो जाता हैं !!
प्यार देखकर तेरा इतना आँसु भी रो देता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

सूनी पड़ी उन गलियों में, याद वो बचपन आता हैं,
तब यादों में दबी कलम की स्याही वो बन जाता हैं !!
कागज़ को छूता ये आँसु, बस यही समझाता हैं,
अब हर घड़ी, हर पल भाई तू याद बहुत आता है...!!!

Thursday, June 4, 2015

लिखने की "कोशिश" करती हूँ मैं

कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

दिन के उजियारे में, रात के अंधियारे में,
वो भीगी शाम में, किसी के इंतज़ार में,
दिल का हाल सुना जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

बारिश के मौसम में, छुपते हुए चाँद में,
वो नम पलकों से, कोरे पड़े कागज़ पे,
इन्द्रधनुष से रंग चुराकर, शब्दों को रंगीन कर जाती हूँ  मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

वो झूठे सच्चे ख्वाब में, कल्पना की बाढ़ में,
सूनी अँधेरी रात में, ख़ामोशी के साथ में,
यादों के बंद दरवाज़े खोल देती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

झूमती हवाओ में, रूसवा होती मुस्कान में,
होंठो की ख़ामोशी में, चेहरे की मायूसी में,
बिन कहे सब कुछ कह जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

उलझे हुए जवाबों में, टूटे हुए ख़यालो में,
धूंधली पड़ी यादों में, जलती हुई आँखों में,
बिखरे हुए सपनें फिर सजाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

ज़िंदगी की राह में, धुप में कभी छाँव में,
भीगी हुई पलकों पे, हसीं की चादर से,
गम सारे ओढ़ लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

जुदा हुए किनारों में, चमकते हुए सितारों में,
हँसते हुए चेहरों को, धोखा देती तसवीरों को,
फिर से सच मान लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

झूठी ख़ुशियों की सजावट में, चेहरे की लिखावट में,
हाथों की लकीरों में, पकड़ी हुई कलम से,
कलम को ही रुला जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

अक्षरों के जाल में, पाँत पाँत और डाल में,
बीते हुए कल में, थमे हुए जल में,
अपने ही अक्श को तलाशती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

Friday, May 22, 2015

"ख़ामोशी" एक कलम की

वो ढलती शाम में, उगते चाँद में, ना जाने किसका इन्तज़ार करती है,
है पास बहुत, मगर दूर, इस सच को झूठलाती है,
ख़ुशी को लबों पे कैद किए, वो आँशुओं से मुसकाती है,
वो बदल गई है, पर ना बदली, "कलम" ये बतलाती है...!!

ख़ामोशी से कर के दोस्ती, वो दोस्ती निभाती है,
यादों के पन्ने पलट के, फिर खो कही जाती है,
आशाओं का दीया बूझाकर, अँधेरे में जीती है,
ख़ुश है वो, पर ख़ुश नहीं है, "कलम" ये बतलाती है...!!

चुप चुप-सी वो रहती है, कुछ खोई-सी रहती है,
फूलों को ठुकरा कर, अब काँटो संग वो चलती है,
झूठे सच से लड़ते-लड़ते, फिर खुद से हारी है,
है साथ, मगर वो साथ नहीं है, "कलम" ये बतलाती है…!!

सजा देकर खुद को वो, कुछ टूट-सी जाती है,
भीगी पलकों पे मासूम ख्वाहिशें, अब हर पल मुरझाती है,
अश्क़ों को बनाके "आख़र", कविता में समझतीं है,
ज़िंदा है, पर ज़िंदा नहीं, "कलम" ये बतलाती है....!!!

Sunday, May 10, 2015

"माँ"

एक अक्षर का शब्द है "माँ", लगता कितना सुनहरा,
जाने पहचाने इस शब्द में राज़ छुपा है गहरा !!

दर्द तकलीफ़ सहकर भी हमको इस दुनिया में लायी,
लेकर हाथों में पहली बार, वो दर्द सारा भूल गयी !!

भूखी रहकर खुद वो, पहले खाना हमको खिलाती,
अँधेरी रातों संग जगकर, बाहों में अपने सुलाती !!

नन्हें से बच्चों को वो, स्कूल जब भेजा करती,
बच्चों को रोता देख वो "माँ", खुद छुप छुप के रोती रहती !!

बच्चों के वापस आने की राह वो देखा करती,
सुन बच्चों की आवाज़ वो "माँ", गले से यू लगा लेती !!

बच्चों के साथ बनकर बच्चा, नख़रे सारे उठाती,
खुद आँसू गिराकर वो "माँ", लबो पे सबके मुस्कान सजाती !!

मुश्किल में देख बच्चों को, खुद भी टूट जाती,
लड़ने को उस मुश्किल से फिर, हिम्मत भी दे जाती !!

पढ़ा-लिखाकर जब हमें, वो बड़ा करती,
सफलता मिले हर मोड़ पर, रब से यहीं मांगा करती !!

फिर क्यू बच्चे उस "माँ" को यू ही ठुकरा देते,
नौ महीनों के उस दर्द को, नौ पल में भूल जाते !!

फिर उसी "माँ" को वो बच्चे बोझ समझने लगते,
तब डाल किसी वृद्धाश्रम में, खुद चैन से जीतें !!

बच्चों से होके जुदा वो पल पल मरा करतीं,
ख़ुशी समझकर बच्चों की वो "माँ" वहाँ भी रह लेती !!

तकलीफ में हो बच्चा तो वो उस पल भी दुआ करती,
क्यूँ इतना सहने पर भी वो "माँ" यही कामना करती !!

देखकर "माँ" का इतना त्याग, क्यूँ बच्चों का दिल ना पिघल पाया,
लिखतें - लिखतें तो आज मेरी "कलम" को भी रोना आया !!!

Wednesday, April 15, 2015

"मासूम इंतज़ार"

कुछ पल रेत की तरह फिसल जाता हैं,
चाहो, ना चाहो हाथ से छूटता जाता हैं,
सारे लम्हें, सारे पल बीत जाया करते हैं, एक कहानी की तरह,
साथ रह जाती है तो बस, "एक मासूम सी ख़ुशी और एक मासूम सी हँसी"…!!!

कुछ यादें हँसाती हैं, कुछ रुला जाती हैं,
कुछ याद रह जाती हैं, भूला दी जाती है कुछ,
वक्त के पहियों पे चढ़कर सब चले जाते हैं,
साथ निभाता है तो बस, "एक मासूम सा आँसू और एक मासूम सा इंतज़ार"…!!!

जिस जगह पे इंतज़ार  किया, उसी जगह से ही किया विदा था,
समय का वो पहिया घूम के वापस आया था,
आँखों  को अकेला कर आँसू भी छोड़ जा रहे थे,
साथ रह गया था तो बस, "एक मासूम सा गम और एक मासूम सा दर्द"....!!!

जिन हाथों ने गले लगाया था, उन्हीं हाथों ने क्यू अलविदा कहा,
कल वो सब जाहा खड़े थे, आज मै खड़ी थी वहा,
उस वक़्त मैं छोड़ जा रही थी और इस वक़्त वो रुकसत कर रहे थे,
साथ थी तो बस, "एक मासूम सी मुलाकात और एक मासूम सी जुदाई"....!!!

साथ बिताए सारे लम्हें याद आते हैं,
कभी आँसु, तो कभी मुस्कान दे जाया करते हैं,
वक़्त के उस पहिए में सारे दुःख कुचले जाते हैं,
ज़िन्दा रह जाती है तो बस, "एक मासूम सी याद और वक मासूम सी मस्ती"....!!!

फिर मिलने की आशा से ही, शायद दिल ने उन्हें रोका ना था,
विश्वास था वो इतना अडिग की आँसू भी मेरा मुस्कुरा रहा था,
उन सब चेहरों को वो आँसू धूंधला किए जा रहा था,
साफ थी तो बस, "एक मासूम सी उम्मीद और उस उम्मीद पे जीती मैं"....!!!

Friday, April 10, 2015

हज़ारो ख्वाबों को यू आँखों में बसा बैठी,
पूरा उन्हें करने की, नाकाम कोशिशें कर बैठी,
आज खुशियाँ रूठ गयी मुझसे,
मैं गमो से दोस्ती कर बैठी....!!

चाहत थी फूलों सी खिलखिलाने की,
हसरत थी आँसूओ को मिटाने की,
आज फूल रूठ गए मुझसे,
मैं कांटों से दोस्ती कर बैठी....!!

थी आदत मुझे पल पल मुस्कुराने की,
अकेले में खुद से गुनगुनाने की,
आज मुस्कान रूठ गयी मुझसे,
मैं आँसूओ से दोस्ती कर बैठी....!!

क़ोशिश थी सबको ख़ुश कर देने की,
सबके दिलों से ख़ामोशी हटाने की,
आज अपने रूठ गए मुझसे,
मैं ख़ामोशी से दोस्ती कर बैठी....!!

शांत पलकें कुछ यू फड़फड़ा उठी,
जलते हुए पानी से आज भीग उठी,
रोकना चाहा बहूत पलकों ने,
पर आँसूओ की वो धारा आज खुदखुशी कर बैठी...!!!!