वो ढलती शाम में, उगते चाँद में, ना जाने किसका इन्तज़ार करती है,
है पास बहुत, मगर दूर, इस सच को झूठलाती है,
ख़ुशी को लबों पे कैद किए, वो आँशुओं से मुसकाती है,
वो बदल गई है, पर ना बदली, "कलम" ये बतलाती है...!!
ख़ामोशी से कर के दोस्ती, वो दोस्ती निभाती है,
यादों के पन्ने पलट के, फिर खो कही जाती है,
आशाओं का दीया बूझाकर, अँधेरे में जीती है,
ख़ुश है वो, पर ख़ुश नहीं है, "कलम" ये बतलाती है...!!
यादों के पन्ने पलट के, फिर खो कही जाती है,
आशाओं का दीया बूझाकर, अँधेरे में जीती है,
ख़ुश है वो, पर ख़ुश नहीं है, "कलम" ये बतलाती है...!!
चुप चुप-सी वो रहती है, कुछ खोई-सी रहती है,
फूलों को ठुकरा कर, अब काँटो संग वो चलती है,
झूठे सच से लड़ते-लड़ते, फिर खुद से हारी है,
है साथ, मगर वो साथ नहीं है, "कलम" ये बतलाती है…!!
फूलों को ठुकरा कर, अब काँटो संग वो चलती है,
झूठे सच से लड़ते-लड़ते, फिर खुद से हारी है,
है साथ, मगर वो साथ नहीं है, "कलम" ये बतलाती है…!!
सजा देकर खुद को वो, कुछ टूट-सी जाती है,
भीगी पलकों पे मासूम ख्वाहिशें, अब हर पल मुरझाती है,
अश्क़ों को बनाके "आख़र", कविता में समझतीं है,
भीगी पलकों पे मासूम ख्वाहिशें, अब हर पल मुरझाती है,
अश्क़ों को बनाके "आख़र", कविता में समझतीं है,
ज़िंदा है, पर ज़िंदा नहीं, "कलम" ये बतलाती है....!!!
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