Saturday, February 1, 2025

रात

 न जाने कितनों को सुना होगा रात ने,

ना कुछ समझाया, ना कुछ कहा,

और ना झुठलाया होगा,

बिना किसी राय के.....

बस सुना होगा ||

Wednesday, July 17, 2024

तुम चाँद बन जाओ

सुनो.... तुम चाँद बन जाओ,

मैं हर दिन,

रात का इंतजार किया करूँगी...

और ऐसी ही किसी रात,

दबे पावँ छत पर चले आना 

तुम्हारे आने पर कुछ सितारे चमका दूँगी

और

थोड़े बादल बिछा दूँगी...

गर कोई आ जाए, तो अंधेरे में कहीं छुप जाना 

फिर आना, मेरे पास...

उन्हीं बादलों में कहीं बैठ जाना

मैं तुम्हारी गोद में सो जाया करूँगी...

जानती हूँ, तुम्हें कविताएं पसंद हैं 

मैं तुम पर दर्जनों काव्य लिखूंगी

फिर इत्मीनान से बैठना मेरे पास...

एक-एक करके सब सुनना,

गर अच्छा लगे कुछ 

तो थोड़ी तारीफ भी कर लेना...

क्या करते हो? कहाँ रहते हो?

ये सब ज़रा विस्तार से बताना 

कुछ ऐसा भी बताना कि बंद ना हो मेरा इतराना

जो मांगू वो देना, इतना अधिकार तुम मेरा जानना,

एक अंगूठी में जड़वाकर अपना स्याह भाग मुझे पहनाना,

फिर जाते-जाते कुछ ना कहना, बस एक वादा करते जाना,

गर तारा कोई टूटे, तुम मुझे मांग लेना।


Sunday, May 2, 2021

अंधेरा

 ए अंधेरे सुन ,

ब डर नहीं लगता तुझसे 

ज़िंदगी का अपनी,तुझे राज़दार बनाया है।

सब कुछ जानता है तू,

तुझे हर गम का हिस्सेदार बनाया है 


सुना है, अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं देता, 

फिर कैसे तू सब कुछ देख लेता है ?

लोग समझाने से भी नहीं समझते 

कैसे तू बिना कहे सब जान लेता है ।


मेरी कलम से....


Wednesday, January 17, 2018

"माँ मै ख़ुश हूँ"

माँ मै ख़ुश हूँ।

हाँ कभी-कभी उदास हो जाती हूँ।
और फ़िर अकेले मे आँसु भी बहाती हूँ।
पर तेरा चेहरा देख मुसकुराने फिर लगती हूँ।। 

हाँ कभी-कभी मन नहीं लगता।
कुछ खोई-खोई सी रहती हूँ।
पर तेरी यादों को याद कर मुसकाती चली जाती हूँ ।।

हाँ माँ मै ख़ुश हूँ। 

कभी-कभी यू ही रोने लगती हूँ।
बिन बात के गुस्सा करती हूँ।
फिर तेरी हँसी देख खुद भी हँसने लगती हूँ।।

कभी-कभी अँधेरा डराने लगता हैं।
अँधियारे में आँखे मुंद लेती हूँ।
फिर बातों को याद कर तेरी, हिम्मत आ जाती हैं।। 

हाँ माँ मै ख़ुश हूँ। 

कभी-कभी दिल सूना सा लगता हैं।
हर तरफ ख़ामोशी-सी लगती है।
तब साथ बिताए पलों को याद कर खुश मै हो जाती हूँ।।

कभी-कभी अकेला सा लगता हैं।
दिल बेचैन हो जाता हैं।
फिर तेरे एहसास से सुनापन दूर हो जाता हैं।।

हाँ माँ मै ख़ुश हूँ।

तेरी ही परछाई हूँ, तेरे जैसी ही हूँ।
तेरा ही चेहरा है, तेरा ही सब कुछ।
फिर भी तेरी ज़रूरत है.... 
क्योंकि सबसे अलग है तू।।

हाँ माँ तेरा साथ है तो, ख़ुश हूँ मै...... 


Friday, September 18, 2015

" रक्षाबन्धन "

अपनत्व, सहयोग, प्यार का दिन वो ऐसा आता है,
लबों पे लाके मुसकान वो धागा कलाई पे बंध जाता है !!
भाई - बहन का असीम स्नेह जब कलाई पे छा जाता है,
रक्षाबन्धन के पावन पर्व को परिभाषित कर जाता है..!!!

खट्टे मीठे लम्हों की याद लिए धागा बंध जाता है,
फिर साथ बिताई यादों का कोहिनूर बन जाता है !!
खुद सूरज सा जलकर जब चाँद, बहन को बना जाता है,
तब सफलता, समृद्धि, स्नेह का बहन से "आशीष" मिल जाता है..!!!

सूत्र बाँध रक्षा का जब रक्षा-वचन लिया जाता है,
वचन निभाने को फिर, हर लक्ष्य को छू जाता है !!
दिये सा जलकर उसका तेज अँधियारा मिटाता है,
भाई - बहन के प्रेम का "प्रतीक", धागा बन जाता है..!!!

तर होके धागा स्नेह प्यार में, विश्वास अंकुर कर जाता है,
नाजूक सा धागा न जाने, कैसे रक्षा करता है !!
इसी विश्वास की अमिट छाप जब कलाई पे अंकित होती है,
बंधा हुआ वो नाजूक धागा, "रक्षासूत्र" कहलाता है..!!!

Monday, July 27, 2015

"भाई" तू याद बहुत आता हैं !!

डरा हुआ सा, कुछ सहमा सा, आँसु बहता जाता हैं,
आँखों से हो विदा वो, मोम सा पिघलता हैं !!
रोती हुई उन आँखों को जब कोई नहीं हँसाता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

कुछ घबराता, कुछ सिसकता आँसु सब कह जाता हैं,
अकेली सी, उन आँखों में सिर्फ दर्द ही कहराता हैं !!
मुरझायी हुई पलकों को जब कोई नहीं सहलाता हैं,
ऐसे लम्हों में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

भूली हुई उन यादों से रंग छीन ले जाता है,
बिन पतवार ही वो अपना रास्ता बनाता हैं !!
ख़ामोशी का आलम बनके सिसकिया सुनाता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

सुनी करके हँसी को अपने पास ही रख लेता हैं,
लबों की मुस्कान को, मायूसी बना जाता हैं !!
आँसुओ को रोकने वो हाथ जब नहीं आता हैं,
ऐसी घड़ी में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

आँखों को दे सूनापन, घुम कही हो जाता हैं,
जाते जाते होंठो पे एक झूठीं मुस्कान दे जाता हैं !!
डरी हुई आँखों को जब पलके गले लगाती हैं,
ऐसे लम्हों में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

बीती हुई उन यादों का आयना दिखता हैं,
होके दूर आँखों से, हाथों में कैद हो जाता हैं !!
प्यार देखकर तेरा इतना आँसु भी रो देता हैं,
ऐसे पल में भाई तू याद बहुत आता हैं...!!!

सूनी पड़ी उन गलियों में, याद वो बचपन आता हैं,
तब यादों में दबी कलम की स्याही वो बन जाता हैं !!
कागज़ को छूता ये आँसु, बस यही समझाता हैं,
अब हर घड़ी, हर पल भाई तू याद बहुत आता है...!!!

Thursday, June 4, 2015

लिखने की "कोशिश" करती हूँ मैं

कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

दिन के उजियारे में, रात के अंधियारे में,
वो भीगी शाम में, किसी के इंतज़ार में,
दिल का हाल सुना जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

बारिश के मौसम में, छुपते हुए चाँद में,
वो नम पलकों से, कोरे पड़े कागज़ पे,
इन्द्रधनुष से रंग चुराकर, शब्दों को रंगीन कर जाती हूँ  मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

वो झूठे सच्चे ख्वाब में, कल्पना की बाढ़ में,
सूनी अँधेरी रात में, ख़ामोशी के साथ में,
यादों के बंद दरवाज़े खोल देती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

झूमती हवाओ में, रूसवा होती मुस्कान में,
होंठो की ख़ामोशी में, चेहरे की मायूसी में,
बिन कहे सब कुछ कह जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

उलझे हुए जवाबों में, टूटे हुए ख़यालो में,
धूंधली पड़ी यादों में, जलती हुई आँखों में,
बिखरे हुए सपनें फिर सजाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

ज़िंदगी की राह में, धुप में कभी छाँव में,
भीगी हुई पलकों पे, हसीं की चादर से,
गम सारे ओढ़ लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

जुदा हुए किनारों में, चमकते हुए सितारों में,
हँसते हुए चेहरों को, धोखा देती तसवीरों को,
फिर से सच मान लेती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

झूठी ख़ुशियों की सजावट में, चेहरे की लिखावट में,
हाथों की लकीरों में, पकड़ी हुई कलम से,
कलम को ही रुला जाती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!

अक्षरों के जाल में, पाँत पाँत और डाल में,
बीते हुए कल में, थमे हुए जल में,
अपने ही अक्श को तलाशती हूँ मै,
कभी कभी कलम से बतियाती हूँ मैं, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ मैं…!!